इंटरनेट की दुनिया में मस्क को टक्कर देंगे अंबानी,स्पेस में भेजेंगे 1,600 सैटेलाइट्स

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट (Satellite Internet) क्रांति की दिशा में एक बहुत बड़ा धमाका हुआ है. रिलायंस जियो (Reliance Jio) के 1,600 लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स लॉन्च करने के महत्वाकांक्षी प्लान को Indian National Space Promotion and Authorization Centre (IN-SPACe) से महत्वपूर्ण तकनीकी मंजूरी (Technical Nod) मिल गई है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, इस मंजूरी के साथ ही जियो भारत का पहला स्वदेशी सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन (Homegrown Satellite Constellation – उपग्रहों का नेटवर्क) तैयार करने के बेहद करीब पहुंच गया है. यह कदम देश के कोने-कोने तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने के मुकेश अंबानी के सपने को स्पेस के रास्ते हकीकत में बदलेगा.मीडिया रिपोर्ट में नाम न बताने की शर्त पर सरकारी अधिकारियों ने बताया कि स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe ने रिलायंस जियो के लगभग 1,600 लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट तैनात करने के प्रस्ताव को “तकनीकी रूप से सही” और स्टारलिंक जैसे ग्लोबल सिस्टम के बराबर माना है. यह मूल्यांकन इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe), इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) और डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (DoT) के वायरलेस प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन (WPC) विंग ने किया था.

इस मंजूरी के बाद, सरकार ऑर्बिटल स्लॉट हासिल करने के लिए मुकेश अंबानी की कंपनी को इंटरनेशनल लेवल पर रेगुलेटरी सपोर्ट दे सकती है. कंपनी ने इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन (ITU) फाइलिंग और दूसरी कंपनियों के साथ तालमेल के जरिए ऑर्बिटल अधिकार पाने के लिए सरकार से मदद मांगी थी.इस कदम से भारत के लिए अपना पहला लोकल LEO कॉन्स्टेलेशन (उपग्रहों का समूह) बनाने का रास्ता साफ हो गया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक रक्षा ज़रूरतों के लिए बहुत ज़रूरी है. LEO सेक्टर में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक का दबदबा है, जिसके पास 10,000 से ज़्यादा सैटेलाइट हैं. लेकिन जियोपॉलिटिकल टकरावों की वजह से देश विदेशी सैटेलाइट कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं. इस बातचीत की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि जियो ने जिस तरह की क्षमता की योजना बनाई है, वह भारत के लिए अब तक की सबसे ज़्यादा क्षमता है. कंपनी ने भारत में 4.5-5 टेराबिट प्रति सेकंड (Tbps) की थ्रूपुट क्षमता देने का प्रस्ताव रखा है.इसकी तुलना में, स्टारलिंक के पास 600 गीगाबिट प्रति सेकंड (Gbps) की मंजूरी है, जबकि अमेजन लियो (Amazon Leo) की योजना भारत में 3 Tbps क्षमता रखने की है, लेकिन कंपनी को अभी IN-SPACe से मंजूरी मिलनी बाकी है. एक और व्यक्ति ने कहा कि जियो (Jio) के कॉन्स्टेलेशन के ऑर्बिटल पैरामीटर, कॉन्फ़िगरेशन और आर्किटेक्चर की वजह से भविष्य में यह दूसरे भारतीय कॉन्स्टेलेशन के साथ मिलकर काम कर सकता है.प्रस्ताव के अनुसार, जियो ब्रॉडबैंड, सेल्युलर बैकहॉल जैसी फिक्स्ड सैटेलाइट सर्विस और डायरेक्ट-टू-डिवाइस जैसी मोबाइल सैटेलाइट सर्विस देने की योजना बना रहा है. कंपनी 20-22 ग्राउंड स्टेशन बनाने की योजना बना रही है.सरकार को दी गई अपनी राय में, स्पेस रेगुलेटर ने जियो के प्रस्ताव के फ़ायदों पर ज़ोर दिया है, जिसमें रणनीतिक रक्षा ज़रूरतों को पूरा करना और विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना शामिल है. रेगुलेटर का मानना ​​है कि कंपनी को रेगुलेटरी और अन्य पॉलिसी सपोर्ट दिया जाना चाहिए ताकि भारत को अपना पहला घरेलू, नॉन-जियोस्टेशनरी (NGSO) कॉन्स्टेलेशन मिल सके. तकनीकी वैल्यूएशन के अलावा, सरकार के हाई लेवल पर शुरुआती बातचीत हुई है कि क्या कुछ LEO सैटेलाइट पर डिफेंस पेलोड लगाए जा सकते हैं.अब तक फाइबर केबल बिछाकर हर गांव तक इंटरनेट पहुंचाना भौगोलिक चुनौतियों (जैसे पहाड़, घने जंगल और द्वीप समूह) के कारण बहुत कठिन और महंगा था. लेकिन सैटेलाइट इंटरनेट इस पूरी गणित को बदल देगा.उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी गांवों से लेकर उत्तर-पूर्व के जंगलों तक, सीधे आसमान से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी. जियो हमेशा से अपनी ‘आक्रामक प्राइसिंग’ के लिए जाना जाता है. स्वदेशी नेटवर्क होने के कारण उम्मीद की जा रही है कि जियो का सैटेलाइट इंटरनेट विदेशी कंपनियों (जैसे स्टारलिंक) के मुकाबले काफी सस्ता होगा. बाढ़, भूकंप या चक्रवात के समय जब मोबाइल टावर गिर जाते हैं, तब भी सैटेलाइट इंटरनेट बिना किसी बाधा के काम करता रहेगा.

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