बिहार विधान सभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड जीत हासिल हुई, जिसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में गठबंधन की नई सरकार बनी। फिर भाजपा के शीर्षस्थ नेता ने बांकीपुर विधान सभा से चौथी बार जीते विधायक नितिन नवीन को पहले राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और फिर निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। संवैधानिक रूप से नितिन नवीन भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। अब एक बार फिर सवाल यह उठने लगा है कि क्या असिस्टेंट प्रोफेसर का पद लेने वाले अशोक चौधरी भी नितिन नवीन की तरह मंत्री पद छोड़ेंगे? फिलहाल यह चर्चा जोरों पर है। बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी पर उठाए गए सवाल पर अब सवाल यह उठने लगे हैं कि क्या कोई शख्स दो जगह से नौकरी और भत्ता एक साथ ले सकता है या नहीं? अशोक चौधरी या तो फ्री में पढ़ाएंगे या विधायक वाली सुविधाएं छोड़ेंगे? इस तकनीकी सवालों के संबंध में जानकारी देते हुए राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब अशोक चौधरी राजनीति के साथ-साथ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के तौर पर शामिल हुए हैं।

उनसे पहले भी कई ऐसे लोग हुए जो कॉलेज में प्राध्यापक रहते हुए राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने आगे बताया कि चूंकि प्राध्यापकों का वेतन विधायक की अपेक्षा ज्यादा होता है इसलिए लोग वेतन विश्वविद्यालय का लेते हैं और चूंकि भत्ता विश्वविद्यालय की अपेक्षा विधायक का ज्यादा होता है, इसलिए लोग भत्ता विधायक का लेते हैं। इस स्थिति में नौकरी छोड़ने या विधायकी छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती है।