बिहार की राजनीति में बड़ी उलटफेर करेंगे मुसलमान,जान लीजिए क्या है पूरी खबर?

भाजपा अब पसमांदा मुसलमानों को लेकर अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करती नजर आ रही है. पहली बार पार्टी ने इस समुदाय को केंद्र में रखकर पसमांदा सम्मेलन आयोजित कर रही है. बीजेपी नेता अब खुलकर मंचों से यह कह रहे हैं कि पसमांदा समाज उनकी प्राथमिकता में है. एनडीए परंपरागत वोट बैंक से इतर पार्टी अब अल्पसंख्यक समुदाय, विशेष रूप से पसमांदा मुसलमानों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है।बीजेपी परंपरागत रूप से हिंदू वोट बैंक पर केंद्रित भाजपा अब बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम समाज के पसमांदा तबके की ओर भी हाथ बढ़ा रही है. पार्टी की रणनीति साफ है. राजनीतिक दायरे को बढ़ाना और सामाजिक समीकरणों को फिर से गढ़ना. पसमांदा सम्मेलन इस बात के संकेत हैं कि भाजपा अब सामाजिक समरसता के जरिए बिहार की राजनीति में नई लकीर खींचना चाहती है।भाजपा पहली बार खुलकर पसमांदा मुसलमानों को साधने के लिए सम्मेलन आयोजित कर रही है. पार्टी नेता भी अब सार्वजनिक मंचों से यह स्वीकार कर रहे हैं कि पसमांदा समाज से उनका कोई बैर नहीं है, बल्कि वे उनकी चिंता और भागीदारी को महत्व देते हैं.

बिहार में 17.70% आबादी मुसलमानों की है और मुसलमानों की आबादी में 75 से 80% आबादी पसमांदा मुसलमानों की है. अति पिछड़ा वोट बैंक की अगर बात कर ले तो बिहार में कुल मिलाकर 112 जातियां अति पिछड़ा समुदाय में है 112 में 27 जातियां अल्पसंख्यक समुदाय से है. भाजपा की नजर 27 जातियों पर है जो राजनीति और विकास के दौड़ में पीछे रह गए हैं।बिहार में जातिगत जनगणना 2022-23 के आंकड़ों ने राज्य के सामाजिक ढांचे की गहराई से पड़ताल की है. इस जनगणना से स्पष्ट हुआ है कि मुसलमानों की आबादी न केवल धार्मिक दृष्टि से विविध है, बल्कि जातीय स्तर पर भी अनेक वर्गों में विभाजित है. विशेष रूप से पसमांदा मुसलमान जो पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्गों से आते हैं. उसकी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है।भाजपा के मीडिया सह प्रभारी दानिश इकबाल ने कहा कि बीजेपी के नेता सीधे समुदाय के बीच जाकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ उन्हें कैसे मिल रहा है और सरकार उनकी बेहतरी के लिए किन स्तरों पर काम कर रही है. इसी दिशा में भाजपा बिहार प्रदेश कार्यालय में एक विशेष सम्मेलन आयोजित करने जा रही है जिसमें प्रदेश के कई बड़े नेता शामिल होंगे।कहा जा रहा है कि यह स्थिति लालू प्रसाद यादव और उनके गठबंधन के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है. क्योंकि अब तक मुस्लिम-यादव समीकरण महागठबंधन की सबसे बड़ी ताकत माने जाते रहे हैं।बिहार की वर्तमान यानी नीतीश सरकार का कार्यकाल 23 नवंबर 2020 से शुरू हुआ था. नीतीश सरकार का कार्यकाल इस साल यानी 2025 में 22 नवंबर तक है. जाहिर है कि इससे पहले चुनाव होंगे. माना जा रहा है कि सितंबर से अक्टूबर के बीच आचार संहित लग जाएगी. माना ये भी जा रहा है कि अक्टूबर से नवंबर के शुरुआती हफ्ते के बीच वोटिंग और मतों की गिनती संपन्न कराई जा सकती है।

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