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जानें आखिर पेरिस से लगातार हथियार क्यों खरीद रहा है इंडिया?पीछे छूट गया अमेरिका-रूस

जानें आखिर पेरिस से लगातार हथियार क्यों खरीद रहा है इंडिया?पीछे छूट गया अमेरिका-रूस
  • PublishedFebruary 18, 2026

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार देश है. हालांकि बीते एक दशक में भारत की हथियार खरीद का पूरा नक्शा बदल गया है. भारत को हथियार बेचने के मामले में पहले रूस और अमेरिका का दबदबा था, लेकिन अब फ्रांस तेजी से आगे आ रहा है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI के मुताबिक, भारत ने 2006 में रूस से 1 बिलियन TIV और अमेरिका से 0.1 बिलियन TIV के हथियार खरीदे. उस साल फ्रांस से कोई सौदा नहीं हुआ. 2010 से 2015 के बीच रूस से 4 बिलियन TIV और अमेरिका से करीब 1 बिलियन TIV तक के सौदे हुए, लेकिन फ्रांस से कोई डील नहीं हुई. 2016 में पहली बार फ्रांस से भारत ने हथियार खरीदे और तब से फ्रांस की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है.SIPRI हथियारों की खरीद-बिक्री को पैसों में नहीं, बल्कि TIV (Trend Indicator Value) में मापता है. TIV का मतलब है किसी हथियार की उत्पादन लागत के आधार पर उसका एक तय मूल्य. यह डॉलर में नहीं होता, बल्कि एक वर्चुअल यूनिट है जो तुलना के लिए बनाई गई है.

इससे यह समझना आसान होता है कि कौन देश किससे कितना और क्या-क्या खरीद रहा है.2015 से 2024 के बीच भारत ने जिन देशों से सबसे ज्यादा हथियार खरीदे, उनमें रूस अभी भी पहले नंबर पर है. इस दौरान भारत की कुल हथियार खरीद में रूस की हिस्सेदारी 36% रही है. हालांकि यह पहले के मुकाबले काफी कम है. 2010 से 14 में यह हिस्सा 72% था और 2015 से 2019 में 55% था. यानी भारत अब रूस पर पहले जितना निर्भर नहीं है. फ्रांस दूसरे नंबर पर है, जिसकी हिस्सेदारी 28% रही. इजराइल 14% के साथ तीसरे स्थान पर है. वहीं अमेरिका चौथे नंबर पर रहा.SIPRI के मुताबिक, भारत के कुल हथियार खरीद में 2015 से 2019 की तुलना में 2020 से 2024 के बीच 9.3% की गिरावट आई है, फिर भी भारत दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार देश बना हुआ है. पहले नंबर पर यूक्रेन है.इसके पीछे कई कारण हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी हथियारों की आपूर्ति पर सवाल उठे. रूस खुद युद्ध में लगा हुआ है, इसलिए भारत को समय पर हथियार मिलने में दिक्कत आने लगी. वहीं अमेरिका ने हथियार बेचने के साथ कई शर्तें भी लगाईं. दूसरी तरफ फ्रांस ने बिना शर्त और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ हथियार देने का भरोसा दिया. भारत की हथियार खरीदी में बदलाव सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है. भारत अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से रूस पर निर्भरता घटा रहा है, अमेरिकी शर्तों से बचते हुए फ्रांस के साथ बराबरी के रिश्ते भी बना रहा है.भारत ने पहले 36 राफेल लड़ाकू विमान (₹58,891 करोड़ रुपये) और 6 स्कॉर्पीन पनडुब्बियों (₹36,000) का सौदा किया. इसके बाद नेवी के लिए 26 मरीन वेरिएंट राफेल (लगभग 63,000 करोड़ रुपये) और 3 स्कॉर्पीन पनडुब्बियों (₹36,000 करोड़) का ऑर्डर दिया. इसके अलावा भारत ने राफेल और मिराज विमानों के लिए स्कैल्प, हैमर और मीटियर जैसी घातक मिसाइलों के अलग-अलग सौदे किए हैं. इन मिसाइलों और मिराज-2000 के बेड़े के रखरखाव और अपग्रेड पर लगभग ₹3,200 करोड़ से अधिक का खर्च शामिल है. यानी कुल मिलाकर भारत ने फ्रांस से बीते 10 साल में 1.97 लाख करोड़ रुपए के हथियार खरीदे हैं.फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों फिलहाल भारत दौरे पर हैं. भारत और फ्रांस के बीच जल्द ही 114 राफेल विमानों की खरीद पर मुहर लगने वाली है. करीब ₹3.25 लाख करोड़ की इस डील को भारत का अब तक का सबसे डिफेंस सौदा माना जा रहा है. अगर 36 राफेल, 26 मरीन राफेल, 9 स्कॉर्पीन पनडुब्बी, मिसाइलों और 114 नए राफेल को जोड़ा जाए, तो भारत की फ्रांस से हथियार खरीद 5.22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की हो जाएगी.

Written By
Aagaaz Express

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