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45 वाइस चांसलरों में गिने-चुने है पिछड़े-दलित,उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव!

45 वाइस चांसलरों में गिने-चुने है पिछड़े-दलित,उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव!
  • PublishedJanuary 28, 2026

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की स्थिति एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है. भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ बढ़ते भेदभाव को लेकर बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने चिंता जताते हुए चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं.राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने आंकड़ों के अनुसार, दावा किया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में SC, ST और OBC वर्ग के खिलाफ भेदभाव के मामलों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वहीं, देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नेतृत्व स्तर पर सामाजिक प्रतिनिधित्व की स्थिति भी बेहद कमजोर बताई जा रही है. कुल 45 वाइस चांसलरों में से केवल 1 SC, 1 ST और मात्र 5 OBC वर्ग से हैं. शिक्षण पदों पर आरक्षण की स्थिति भी चिंताजनक है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पदों के लिए OBC के 80 प्रतिशत और ST के 83 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं. वहीं, एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर ST के 65 प्रतिशत, SC के 51 प्रतिशत और OBC के 69 प्रतिशत पद रिक्त बताए गए हैं.

कांग्रेस पार्टी के छात्र संगठन NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने कहा कि जो लोग यह दावा करते हैं कि देश में जातिगत भेदभाव समाप्त हो चुका है, वे जमीनी हकीकत से आंखें मूंदे हुए हैं. उनके अनुसार, यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि उच्च शिक्षा में समान अवसर अभी भी एक अधूरा सपना है. गौरतलब है कि वर्ष 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ UGC रेगुलेशन लागू किए थे.अब 2026 में, भारतीय संसद की उच्च शिक्षा संबंधी समिति द्वारा भेदभाव के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिशों वाली विस्तृत रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद, संशोधित UGC रेगुलेशन पेश किए गए हैं. इसके अलावा, पायल तडवी और रोहित वेमुला की माताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को कैंपस में भेदभाव से निपटने के लिए और सख्त नियम बनाने के निर्देश दिए हैं.NSUI ने मांग की है कि शैक्षणिक परिसरों में जाति, लिंग या किसी भी प्रकार के भेदभाव को बिल्कुल भी बर्दाश्त न किया जाए और समानता, प्रतिनिधित्व व न्याय सुनिश्चित करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं. शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सिफारिशों को गंभीरता से लागू नहीं किया गया, तो सामाजिक न्याय और समावेशी शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल होगा.

Written By
Aagaaz Express

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