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भारत में भी अब आने वाला है प्लास्टिक का नोट!कागज के नोटों से मिलेगी छुटकारा

भारत में भी अब आने वाला है प्लास्टिक का नोट!कागज के नोटों से मिलेगी छुटकारा
  • PublishedMay 29, 2026

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) देश में प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट लाने पर विचार कर रहा है. हाल ही में पटना और मुंबई में हुई केंद्रीय बैंक के बोर्ड की बैठकों में इस पर गंभीरता से चर्चा हुई है. पिछले कुछ वर्षों में नकदी की भारी मांग, कागज के नोटों की छपाई की बढ़ती लागत और उनके जल्दी खराब होने की समस्या को देखते हुए यह फैसला लिया जा रहा है. जल्द ही आम जनता के लिए प्लास्टिक के नोटों का एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू होने की उम्मीद है.भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया वार्षिक रिपोर्ट (FY25) के आंकड़े बताते हैं कि कागज के नोट छापने में 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए. यह पिछले वित्तीय वर्ष के 5,101.4 करोड़ रुपये के मुकाबले काफी ज्यादा है. छपाई का यह खर्च मुख्य रूप से नोटों की बढ़ती मांग के कारण बढ़ा है. मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों का कहना है कि कागज की तुलना में प्लास्टिक के नोट छापना लंबी अवधि में ज्यादा किफायती है. सबसे अच्छी बात यह है कि हमारे एटीएम भी अब इतने एडवांस हो चुके हैं कि वे आसानी से इन पॉलिमर नोटों को पहचान कर बाहर निकाल सकते हैं.अक्सर आपकी जेब में आने वाले नोट मैले या फटे हुए होते हैं. इन खराब नोटों को नष्ट करना भी आरबीआई के लिए एक बड़ा टास्क है. वित्त वर्ष 2025 में 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया. यह आंकड़ा पिछले साल के 21.24 अरब नोटों से 12.3 फीसदी ज्यादा है. इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये के नोट थे, जिसके बाद 100 रुपये के नोटों का नंबर आता है. देश में डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद नकदी का क्रेज कम नहीं हुआ है. 15 मई तक चलन में मौजूद कुल मुद्रा (CiC) सालाना आधार पर 11.5फीसदी बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. ऐसे में प्लास्टिक के नोटों की उम्र कागज के नोटों से कहीं अधिक होने के कारण, बार-बार नए नोट छापने का दबाव काफी कम हो जाएगा.बाजार में 10 रुपये, 20 रुपये जैसे छोटे नोटों की मांग हमेशा बनी रहती है. हालांकि, कुल मुद्रा में इनकी हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम है. केंद्रीय बैंक ने सिक्कों का चलन बढ़ाने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन मनचाहा नतीजा नहीं मिला.

साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपये के एक अरब प्लास्टिक नोटों का फील्ड ट्रायल शुरू किया था. उस वक्त इसका मकसद नोटों की उम्र बढ़ाना था. तब तकनीकी चुनौतियों के कारण वह प्रोजेक्ट रुक गया था. अब एक दशक बाद हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. तकनीक काफी एडवांस हो गई है, जिससे पुरानी सभी बाधाएं दूर हो चुकी हैं.प्लास्टिक के नोटों का विचार वैश्विक स्तर पर कोई नया नहीं है. वर्तमान में दुनिया भर के लगभग 60 देश पॉलिमर बैंक नोटों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस पहल की शुरुआत साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने 10 डॉलर का नोट छापकर की थी. इसके बाद सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड से लेकर मलेशिया तक ने इसे अपनाया. यूरोप में रोमानिया ने 1998 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट पेश किया, जबकि कनाडा ने 2011 में इसे अपने सिस्टम में लागू किया. वहीं, अमेरिकी डॉलर पूरी तरह से प्लास्टिक के नहीं होते, बल्कि वे कॉटन-लिनन के खास मिश्रण से बनाए जाते हैं.

Written By
Aagaaz Express

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